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तो जहर से शुरू होती है सुबह

अंबरीश कुमार

हाल ही में यूरोपीय देशो को दक्षिण भारत से निर्यात की जाने वाली चाय के कई खेप वापस कर दिए गए क्योंकि उनमे कीटनाशक की मात्रा मानदंड से ज्यादा थी ।यह जानकारी कोयंबतूर के एक चाय निर्यातक ने दी जो चाय के छोटे बागवानो से चाय लेकर निर्यात करते है ।छोटे चाय बागवान कीटनाशक पर पैसा नही खर्च कर सकते इसलिए उनकी चाय कीटनाशक मुक्त होती है वे भी कोई आर्गेनिक चाय का उत्पादन नही करते । पर ज्यादातर बड़े चाय बागवान बड़ी मात्रा में कीटनाशक का इस्तेमाल करते है यह तथ्य है ।पिछले साल जब ग्रीन पीस ने चाय की पत्तियों पत्तियों की गुणवत्ता का अध्ययन किया। जिसमे 49 नमूने लिए जिसमें से 34 में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए। इनमें करीब 59 फीसद में तो 10 से भी ज्यादा अलग-अलग तरह के कीटनाशकों का मिश्रण पाया गया। इन नमूनों में से 67 फीसद में डीडीटी का अवशेष भी पाया गया। भारत में 1989 से डीडीटी का प्रयोग प्रतिबंधित है।इसपर काफी हंगामा हुआ और भारतीय चाय बोर्ड ने इसे पूरी तरह ख़ारिज कर दिया ।पर जब यूरोप के कुछ देश ही भारत की चाय को कीटनाशकों के मानदंड पर ठीक ना मानते हुए चाय की कुछ खेप वापस कर दे तो स्थिति साफ हो जाती है ।इस बारे चाय बागान से जुड़े विशेषज्ञों का साफ़ मानना है कि चाय बागान में कीटनाशकों का इस्तेमाल उसी तरह बढ़ रहा है जैसे फल फूल से लेकर सब्जियों और अनाजों में इसका इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है ।वर्ष 2011 की शुरुआत में असम के वन अधिकारियों ने मांग की थी कि काजीरंगा अभ्यारण्य के आसपास के क्षेत्र को कीटनाशक मुक्त किया जाए।उसकी वजह काजीरंगा के पास के चाय बागान में दो गर्भवती हथिनियों, कई जानवरों और चिड़ियों की मौत थी ।बताया गया कि चाय बागान में कीटनाशक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने के बाद यह सब घटनाएं हुई ।इस अंचल के चाय बागान में लाल चींटियों को मारने के लिए भी कीट नाशक का इस्तेमाल किया गया था ।यह बानगी है कि किस तरह चाय तक में कीट नाशक का इस्तेमाल बढ़ रहा है ।खेत बगीचों में तो कीटनाशक का इस्तेमाल बुरी तरह बढ़ता जा रहा है । सेब अंगूर जैसे फल पर इतना कीटनाशक इस्तेमाल होता है कि अगर वह बरसात से धुले नही तो तो बिना धोए खाने पर घातक हो सकता है । जनवरी फरवरी में हिमाचल ,उतराखंड जैसे बहुत से हिमालयी राज्यों में बागवान कीटनाशको का इस्तेमाल करना शुरू कर देते है। इसके साथ सब्जियों और अन्य फसलों में कीटनाशक का इस्तेमाल होता है । मतलब दिनभर हम जो भी आहार लेते है उसमे कीटनाशक किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है ।चाय से तो इसकी शुरुआत होती है और रात के खाने के सलाद तक यह ग्रहण करते रहते है । हरित क्रांति के प्रतीक पंजाब में तो कीटनाशकों का इस कदर इस्तेमाल हुआ कि वहां का भूजल से लेकर खेत तक जहरीला होता जा रहा है ।कैंसर का सबसे ज्यादा प्रकोप भी वहां ज्यादा हो रहा है ।ऐसे में जैविक यानी आर्गेनिक खेती एकमात्र विकल्प के रूप में उभर रही है ।यह बात अलग है कि आर्गेनिक उत्पादों की कीमत बाजार में बहुत ज्यादा होती है जिससे समाज का एक बड़ा तबका उसे खरीद नहीं पाता ।हाल ही में हरित स्वराज ने तराई अंचल में बड़े काश्तकारों को ऐसी आर्गेनिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया है जिसमे उपज की कीमत भी आम लोगों की खरीद सीमा में हो ।इसके लिए रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के सस्ते विकल्प भी पेश किए गए है ताकि यह भ्रम भी टूटे की आर्गेनिक उत्पाद बहुत महंगे होते है ।जब दक्षिण में छोटे बागान वाले बिना किसी कीटनाशक और रासायनिक उर्वरक के कीटनाशक मुक्त चाय बगान में पैदा कर सकते है तो यह प्रयोग अन्य फल सब्जियों और अनाज पर भी हो सकता है ।इसकी शुरुआत देश के बहुत से हिस्सों में सफल भी होती जा रही है ।पर जबतक सरकार इसे प्रोत्साहन नहीं देगी यह आम लोगों से दूर ही रहेगा ।

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ECOLOGICAL NEWS

2014 ECOLOGICAL NEWS

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Ecology, Dignity, Marginalized Majorities

Enabling Knowledge to Combat Global Warming

Towards Discussions on Manifestoes for Ecological Swaraj

Towards Sustainable Solutions (Kosi Floods)

Dialogues on Gandhi and Ecological August-December 2008

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