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पर वे किसी काम के भी नहीं है

 

हम यह मानते रहे हैं कि जैविक खेती और इसके उत्पाद सीधे खेत और किसानों से हमारी रसोई में आयेंगे परन्तु अब यह सच नहीं है. जैसे-जैसे यह तर्क स्थापित हुआ है कि हमें यानी उपभोक्ता को साफ और रसायनमुक्त भोजन चाहियेय वैसे-वैसे देश और दुनिया में बड़ी और भीमकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने

जैविक खेती और जैविक उत्पादों के व्यापार को अपने कब्जे में लेना शुरू कर दिया.
भारत में पारम्परिक रूप से जैविक उत्पाद सामान्यतः सीधे खेतों से लोगों तक पहुंचे हैं. हमारे यहां हाईब्रिड और देशी टमाटर या लोकल लौकी जैसे शब्दों के साथ ये उत्पाद बाजार में आते रहे हैं पर अब बड़ी कम्पनियों ने इस संभावित बाजार पर अपना नियंत्रण जमाना शुरू कर दिया है. तर्क यह दिया जा रहा है कि जितने बड़े पैमाने पर आधुनिक खेती में रसायनों का उपयोग किया जा रहा हैय उसके खतरे को देखते हुये यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है कि उसका मालिकाना हक किसके पास है. पर इसके दूसरी तरफ हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि आज की सबसे बड़ी जरूरत यह तय करने की है कि अनाज, खाद्यान्न और भोजन के उत्पादन का तंत्र और व्यवस्था विकेन्द्रीकृत, जनोन्मुखी और पारदर्शी ही होना चाहिये.

ठण्डे पेयों में कीटनाशकों की खतरनाक स्तर तक मौजूदगी, फिर डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों में अमान्य रसायनों का उपयोग और खेतों में एण्डोसल्फान के छिड़काव के मामलों में बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भूमिका ने यह सिद्ध किया है कि उनके उत्पादों पर विश्वास नहीं किया जा सकता है.

ये महाकाय आर्थिक रूप से सम्पन्न कम्पनियां भी जानती है कि जैविक उत्पादों का बाजार अब तेजी से बढ़ रहा है. रणनीतिक रूप से इन कम्पनियों ने वर्ष 1997 से 2007 के बीच दुनिया भर में 363 छोटी और स्थानीय उत्पादक इकाइयों का अधिग्रहण किया. इनमें से ज्यादातर ने अधिग्रहण के बाद भी उन स्थानीय ब्राण्डों के नाम से ही व्यापार किया ताकि उनकी बदनामी का असर इस नये व्यापार पर न पड़े. कोकाकोला ने आनेस्ट-टी का अधिग्रहण किया. मुईर ग्लेन और कास्केडियन फार्म को स्माल पेनेट फूड्स के नाम से चलाया जा रहा है जो वास्तव में जनरल मिल्स की कम्पनी हैं.

आनेस्ट टी पर कोकाकोला के नियंत्रण की बात जब लोगों कोपता चली तो उसकी दुनिया भर में व्यापक प्रतिक्रिया हुई. सच यह है कि आज बाजार में अनाज और भोजन से लाभ कमाने के लिये उसे किसी भी स्तर तक जहरीला बना देने को तत्पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर आम समाज विश्वास नहीं करता है. वह यह नहीं मान पाता है कि ये कम्पनियाँ वास्तव में सच्चे जैविक उत्पाद उन्हें उपलब्ध करवायेंगे. आर्गेनिक ट्रेड एसोशिएशन ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि वर्ष 2009 में ही जैविक उत्पादों का बड़ा बाजार 11.40 अरब रूपए यानी 24.8 बिलियन डॉलर का हो चुका था. यानी जितनी ज्यादा संभावना उतना बड़ा भोजन पर आर्थिक उपनिवेशवादी खतरा.

वर्ष 2002 से भारत में जैव संशोधित बीजों (बीटी और जीएम) के प्रयोग और उपयोग की शुरुआत हुई. मोनसेंटो जैसी एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी इन बीजों को इस दावे के साथ भारत लाई थी कि बीटी कपास पर बोल्वार्म या कहें कि कपास को खाने वाला एक कीड़ा नहीं लगेगा. इससे कीटनाशकों का खर्च कम होगा. चूंकि इससे उत्पादन बढेगा, इसलिए इन बीजों की कीमत सामान्य देशी बीजों की तुलना में 7 से 8 गुना ज्यादा रखी गयी और मोनसेंटो ने किसानों से खूब कमाई की.

3 साल बाद की यह स्थापित हो गया कि बीटी बीज पर भी कीट लगता है और उसमे पहले की तुलना में ज्यादा रासायनिक कीटनाशकों-उर्वरकों का उपयोग किसान को करना पड़ रहा है. लागत बढ़ी और किसान पर क़र्ज़ः दामों के उतार चढ़ाव के बीच भारत की सरकार ने उन देशों से सस्ती दर के कपास के आयात पर शुल्क कम रखा जहाँ खेती पर बहुत सब्सिडी मिलती है. तर्क यह था कि भारत में कपास का उपयोग करने वाले उद्योगों को सस्ता कपास मिल सके. सरकार ने भारत में तो कृषि पर रियायत कम कर दी, बिजली, उर्वरक, कीटनाशक महंगे हो गए और किसान बाज़ार में आयातित कपास से मार खा गया. विदर्भ में किसानों ने इसीलिए आत्महत्या की है.

अब तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों को नए और तथाकथित उन्नत बीजों या कृषि तकनीकों को व्यापारिक उपयोग में लाने या उनके परीक्षण करने के लिए हर एक मामले में अनुमति लेना होती थी, पर अब यह एक खुला क्षेत्र हो गया है. हमें यह याद रखना होगा कि संकट को हमने खुद आमंत्रित किया है और अपने आप को बर्बाद करने के लिए हम उसे पुरस्कृत भी कर रहे हैं. हमने यह सवाल नहीं पूछा कि भारत में 42 कृषि विश्वविद्यालय और 193 कृषि महाविद्यालय हैं, उन विश्वविद्यालयों ने भारतीय सन्दर्भ में खेती के विकास के लिए जिम्मेदार भूमिका क्यों नहीं निभाई. ये क्यों ईमानदार तरीके से शोध और परीक्षणों का काम नहीं कर सकते थे, क्यों ये बीजों को उन्नत करने की तकनीकों पर काम नही करते! यही कारण है जिनके चलते रसायनमुक्त खेती भारत से लुप्तप्राय होती गई. ऐसे में हमें क्यों यह जरूरत पड़ रही है कि विदेशी कंपनियों, जिनके लाभ के लिए अपने निहित स्वार्थ हैं और जिनके बारे में यह स्थापित है कि उनकी रूचि किसानों के हितों में नहीं बल्कि आर्थिक लाभ में है.

ये कम्पनियाँ बार-बार ऐसे बीज विकसित करती हैं, जिनसे होने वाली पैदावार से अगली बुआई या फसल के लिए उत्पादक बीज नहीं मिल सकते है. मतलब कि हर फसल के समय किसान को एक खास कंपनी के बीज खरीदने पड़ेंगे. उन्होंने ऐसी व्यवस्था भी विकसित कर ली है कि एक खास कंपनी के बीजों पर उसके द्वारा बनाए जाने वाले कीटनाशक और उर्वरक ही प्रभावी होंगे. मतलब साफ़ है कि किसान पूरी तरह से एक कंपनी का बंधुआ होगा. और नयी नीति में सरकार ने इस बन्धुआपन की पूरी तैयारी कर दी है.

सरकार ईमानदार नहीं है इसीलिए तो उसने देश में कृषि शिक्षा को बढ़ावा नहीं दिया. यही कारण है कि वह देश के किसानों के विज्ञान से ज्यादा कंपनियों के लाभ को ज्यादा महत्वपूर्ण मानती है, इसीलिए तो वह अनाज व्यापार के लिए उगाना चाहती है स्वाबलंबन और खाद्य सुरक्षा के लिए नहीं. इसीलिये तो वह देश में कुपोषण और भुखमरी होने के बावजूद देश का अनाज निर्यात करती है या समुद्र में डुबो देती है. इसलिए तो वह यह जानते हुए कि 10 लाख टन अनाज गोदामों में सड़ रहा है पर देश के के लोगों में नहीं बांटती है. सरकार ईमानदार नहीं है.

हम बुनियादी रूप से यह मानते हैं कि भारत में चूंकि 67 प्रतिशत जनसंख्या खेती पर निर्भर है और अब बड़े पैमाने पर किसान भी खेती के स्थाई विकास के लिये रासायनिक खेती को छोड़कर जैविक खेती को अपना रहा है. ऐसी स्थिति में इस क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दखल को खत्म करने की जरूरत है. आंध्रप्रदेश के 23 जिलों के किसान रसायनमुक्त खेती कर रहे हैं पर अब तक देश में इसकी कोई ऐसी नीति नहीं है जो किसानों को बड़े दानवों से सुरक्षित करने की व्यवस्था देती हो.

दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि जैविक खेती के लिये उत्पादन के एक पूरे तंत्र की जरूरत होती है. जिसमें विविध किस्मों के अनाज का उत्पादन, पशुधन का संरक्षण, स्थानीय उर्वरकों और कीटनाशकों का उत्पादन शामिल है. इस बात में शक है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियां इस तरह की व्यवस्था को खड़ा करने में कोई रूचि दिखायेंगी. और पूरी आशंका है कि इसके बजाये वे जैव संशोधित बीजों का उपयोग करेंगी और किसी न किसी रूप में रसायनों का उपयोग करती रहेंगी. यानी जैविक खेती को नये खतरों का सामना करना पड़ेगा. साभार-जैविक खेती

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Challenges of Democratic Governance

Ecology, Dignity, Marginalized Majorities

Enabling Knowledge to Combat Global Warming

Towards Discussions on Manifestoes for Ecological Swaraj

Towards Sustainable Solutions (Kosi Floods)

Dialogues on Gandhi and Ecological August-December 2008

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