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पर्यावरण क्यों नहीं है राजनीति का मुद्दा

अंबरीश कुमार

दिल्ली में यमुना नदी का प्रदूषण कोई नई बात नहीं, लेकिन यह दिल्ली विधानसभा चुनाव का मुद्दा नहीं है। लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में गंगा का सवाल उठाया था, तो एक बहस शुरू हुई। लेकिन वह सब अब गंगा की सफाई तक सीमित रह गया है, प्रदूषण अपने आप में एक मुद्दा बन जाता, यह नहीं हुआ। हालांकि, प्रदूषण कई तरह से लोगों के जीवन पर असर डाल रहा है। एक-दो उदाहरण गौर करने वाला है। उत्तर प्रदेश में देश की 16.3 प्रतिशत आबादी है और जल संसाधन 18.6 प्रतिशत हैं, जबकि बुंदेलखंड में प्रदेश की करीब पांच प्रतिशत आबादी और 3.5 प्रतिशत ही जल है। पिछली दो सदी तक यहां औसतन 16 वर्षों में एक बार अकाल पड़ता था। 1968 से 1992 के दौरान पांच बार अकाल पड़ा और 2004 से 2008 तक चार अकाल पड़े। एक अध्ययन के अनुसार, महोबा, झांसी व चित्रकूट में बारिश 60 प्रतिशत घट गई है। 2013 तक क्षेत्र के 70 फीसदी तालाब, कुएं व टैंक सूख चुके हैं। 2003 में महोबा का मदन सागर टैंक सूखा, जो बीते 900 वर्षों में पहली बार हुआ।

2008 में राज्य सरकार ने अपने की प्रदेश के दो हजार किसानों के खिलाफ शहरों के लिए सुरक्षित पानी को चुराने की पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाई। बावजूद इसके उत्तर प्रदेश में किसी भी चुनाव में बुंदेलखंड के इन सवालों को नहीं उठाया गया। दक्षिण का हाल भी यही है। पांडिचेरी में समुद्री सीमा से करीब 20 किलोमीटर दूर कुडुलूर तक के तटीय क्षेत्र को पेट्रो-केमिकल हब के हवाले किया जा रहा है। कुडुलूर का यह समुद्री तट औद्योगिक कचरे की वजह से पहले से ही प्रदूषित है। तटीय इलाकों में समुद्री खनन का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। माना जा रहा है कि समुद्री खनन शुरू होने के बाद समुद्र भी तेजी से प्रदूषित होगा। तिरुवनंतपुरम से लेकर महाबलीपुरम जैसे सैरगाहों में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए तटीय इलाकों पर अंधाधुंध निर्माण की छूट दी गई, जिसकी वजह से समुद्र तट से पचास मीटर तक पक्का निर्माण हो चुका है। इसका असर समुद्री तट के जीव-जंतुओं पर दिख रहा है। लेकिन चुनाव में समुद्र तट पर मंडराते इन खतरों को लेकर किसी भी राजनीतिक दल ने प्रभावी सवाल नहीं खड़े किए।

अब दिल्ली में लोगों को मुफ्त पानी देने की बात तो की जा रही है, पर यह पानी आएगा कहां से, इसकी कोई सोच नहीं दिख रही। पानी के परंपरागत स्थानीय संसाधनों को लेकर कोई सवाल खड़ा होता नजर नहीं आता। दिल्ली इस मामले में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पूरा शहरी क्षेत्र है और यहां के निवासी अक्सर पानी की किल्लत से जूझते हैं। लेकिन मुख्यधारा के दल इस समस्या के इर्द-गिर्द अपनी चुनावी रणनीति बनाने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। पश्चिमी देशों में मुख्यधारा के दलों ने शुरू में यही रवैया अपनाया था, जिसे ग्रीन पार्टी ने तोड़ा। क्या भारत को भी ऐसी राजनीति की जरूरत नहीं है? साभार -दैनिक हिंदुस्तान

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ECOLOGICAL NEWS

2014 ECOLOGICAL NEWS

2013 ECOLOGICAL NEWS

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Challenges of Democratic Governance

Ecology, Dignity, Marginalized Majorities

Enabling Knowledge to Combat Global Warming

Towards Discussions on Manifestoes for Ecological Swaraj

Towards Sustainable Solutions (Kosi Floods)

Dialogues on Gandhi and Ecological August-December 2008

[Reports from Green features Copenhegan]

 

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