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भू अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ खड़े हो रहे है किसान

अंबरीशकुमार

केंद्र सरकार का भूमि अधिग्रहण अध्यादेश फिर आंदोलन का माहौल बना सकता है ।गौरतलब है कि किसानो की जमीन को लेकर नंदीग्राम से लेकर दादरी जैसे आंदोलनों ने बंगाल से लेकर उत्तर प्रदेश की सत्ता बदल दी थी ।बंगाल में ममता बनर्जी तो उत्तर प्रदेश में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में जो आंदोलन चला वह नजीर बन गया ।मुद्दा किसानो की जमीन का था ।और आंदोलन ऐसा हुआ कि उन उद्योग समूह को न सिर्फ मैदान छोड़ना पड़ा बल्कि सत्तारूढ़ दल को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी ।उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव इसी दादरी आंदोलन से बने माहौल के चलते विधान सभा चुनाव हार गए थे ।इस मुद्दे को लेकर देश भर में किसानो की जमीन अधिग्रहण को लेकर जो बहस छिड़ी उससे कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अधिग्रहण से संबंधित कानून में बदलाव किया तो उसके पीछे जन आंदोलनों का बड़ा दबाव भी था ।इस मुद्दे को लेकर यूपीए के दौर में भी दिल्ली में कई बार धरना प्रदर्शन हुआ और किसानो ने सरकार को बार बार आगाह किया ।हैरानी की बात यह है कि केंद्र सरकार जो भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ले आई है उसका पहला विरोध समाजवादी धारा के जन आंदोलनों और किसान संगठनों ने किया ।इसके बाद बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कांग्रेस ने किया ।मुख्यधारा के समाजवादी दलों के किसी भी बड़े नेता मुलायम ,लालू या नीतीश की कोई फौरी टिपण्णी नहीं आई ।इससे जनता परिवार की वैचारिक समझ पर भी सवाल उठता है और संदेश यही जाता है कि ये भी कांग्रेस भाजपा की तरह उदारीकरण का अप्रत्यक्ष समर्थन करते है ।जन आंदोलनों ने इस नए अध्यादेश का कई तर्कों के आधार पर विरोध किया है और आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है ।बारह जनवरी को मध्य प्रदेश के मुलताई में किसान आंदोलन में शहीद हुए किसानो की सत्रहवीं बरसी पर इस मुद्दे पर हुई किसान पंचायत में आन्दोलन का एलान किया गया है ।इस अंचल में भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर पहले से आंदोलन चल रहा है तो पड़ोस के विदर्भ में बिजली परियोजनाओं के लिए किसानो की जमीन लेने और सिचाई का पानी लेने के सवाल पर पहले से माहौल गर्म है ।

जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय का कहना है कि जो कानून संसदीय समिति (ग्रामीण विकास ) की ओर से सर्वदलीय सहमती से बने मसौदे के आधार पर बना और संसद के दोनों सदनों से पास हो चूका हो वैसे श् भू-अर्जन में पारदर्शिता एवं सही पुनर्वास , कानून, २०१३ में इस प्रकार से बुनियादी संशोधन, जनतंत्र के खिलाफ तथा अनैतिक है ।यह भी कहा गया है कि धारा 105 के तहत एक साल में यानी दिसंबर 2015 तक कानून में संशोधन संभावित है लेकिन जो प्रावधान मूलतरू कानून में है, उन्हें हटाने के लिए इस धारा किसी भी तरह से मजबूर नहीं करती है। तीन कानून जो इसके दायरे में रहे हैं, उनके अलावा 13 कानून (मेट्रो, रेल, हाईवे इत्यादि ) शामिल करने के लिए भी जल्दबाजी का यह कारण गलत है नई सरकार ने जिन धाराओं में बदलाव लाना चाहा है, वह सभी किसानो-मजदूरों-विस्थापितों के पक्ष की धाराएं है ।यही वजह है कि समाजवादी समागम ने भू-अधिग्रहण के संबंध में लाए गए अध्यादेश को कारपोरेट को किसानो की लूट की छुट देने वाला किसान विरोधी अध्यादेश बताते हुए नए अध्यादेश को तत्काल रद्द करने की मांग की है। क्योंकि किसानी ने आन्दोलन और संघर्ष के बाद अंग्रेजो के बनाये हुए भू-अधिग्रहण कानून को रद्द कराने में सफलता पाई थी। ऐसे में संसद सत्र के दौरान सरकार का भू-अधिग्रहण कानून में बदलावों को लेकर चर्चा न कराया जाना संसदीय लोकतंत्र को ठेंगा दिखने जैसा है। पीपीपी प्रोजेक्ट के लिए 70 फीसद और निजी कंपनियों के लिए 80 फीसदी प्रभावित लोगो की सहमती की अनिवार्यता के प्रावधान को समाप्त किया जाना सोशल इम्पैक्ट अध्ययन की अनिवार्यता तथा न्यूनतम खेती का अधिग्रहण करने के प्रावधानों को समाप्त करने से विकास परियोजनाओ के नाम पर जमीन की लूट को क़ानूनी मान्यता मिल जाएगी। जिससे देश भर में व्यापक असंतोष उभरेगा।

इस मुद्दे को लेकर जन संगठनों और आंदोलनों के बीच लगातार संवाद जारी है और कई राज्यों में बैठको का सिलसिला शुरू हो रहा है ।खास बात यह है कि कांग्रेस इस सवाल पर ज्यादा मुखर है और दुसरे राजनैतिक दल खामोश है ।दिल्ली के चुनाव में भी यह मुद्दा उठ रहा है और इसका ग्रामीण हिस्सों पर असर भी पड़ सकता है ।पर देर सबेर किसानो की खेती से जुदा यह मुद्दा सरकार के लिए संकट पैदा कर सकता है ।दरअसल भूमि अधिग्रण कानून को लेकर किसानो ने काफी लंबा संघर्ष किया था और भट्टा पारसौल से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में यह आन्दोलन फैला था ।यह मुद्दा फिर से उन्हें एकजुट कर सकता है क्योंकि यह उनके खेत से जुदा मुद्दा है ।जानकारों का मानना है कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश किसानो की बजाए कारपोरेट घरानों की ज्यादा मदद करने वाला है और इससे किसानो का बड़ा नुकसान होगा ।खेती किसानी को लेकर वैसे भी मोदी सरकार की कई नीतियों को लेकर छतीसगढ़ से पंजाब तक किसान आहत है ।छतीसगढ़ में तो धान किसान सड़क पर आ चुके है क्योंकि चुनाव में भाजपा ने जो वायदे किये थे उसे निभाना तो दूर धन किसानो को मिलने वाला बोनस भी बंद कर दिया गया ।साथ ही लेवी के धान की हदबंदी तय कर दी गई एक एकड़ में दस क्विंटल तक ।इसे लेकर पहले से ही किसान परेशान था और अब यह अध्यादेश किसानो की जमीन पर नया खतरा बनकर आया है ।रोचक यह है कि छतीसगढ़ में भाजपा के नेता भी इसे लेकर आशंकित है क्योंकि किसानो का बड़ा समर्थन उन्हें अबतक हासिल होता रहा है ।पर अब किसान उनके खिलाफ खड़ा हो रहा है ।

किसान संगठनी का आरोप है कि कोई भी निर्वाचित सरकार न्यायोचित ढ़ग से ऐसा काम नहीं कर सकती है, ऐसा अध्यादेश केवल विशेष परिस्थिति में या आपातकालीन स्थिति में ही जारी होता है। सरकार ने न तो संसद में और न जनता के सामने ऐसा कोई कारण दर्शाया है, तो फिर ऐसे अध्यादेश की जरूरत क्यों पडी़? यह सच्चाई देश की जनता के सामने लाना जरूरी है। किसान संगठनों के इस रुख से साफ़ है कि यह मुद्दा आसानी से दबने वाला नहीं है और दिल्ली के चुनाव से भी इसका असर देखा जा सकेगा ।

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ECOLOGICAL NEWS

2014 ECOLOGICAL NEWS

2013 ECOLOGICAL NEWS

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Challenges of Democratic Governance

Ecology, Dignity, Marginalized Majorities

Enabling Knowledge to Combat Global Warming

Towards Discussions on Manifestoes for Ecological Swaraj

Towards Sustainable Solutions (Kosi Floods)

Dialogues on Gandhi and Ecological August-December 2008

[Reports from Green features Copenhegan]

 

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