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देशज समाज के वाहक अनुपम जी का जाना

-गोपाल राम

आज सुबह जब ये समाचार मिला कि अनुपम मिश्र जी नहीं रहे तो तटस्थ नहीं रहा गया। कुछ समय मौन बैठकर उनके होने व न होने के बीच के फासले को तलाशता रहा। इस खोज में लगा कि अनुपम जी जैसे लोग मरते नहीं हैं बल्कि चोला बदलते हैं ताकि एक और नई ऊर्जा के साथ पुनः आकर अपना शेष काम सँभाल सकें। अनायास ही मुझे जीवन तो अमर है का गहरा अहसास छू गया। इस स्पर्श से मैं अनुपम जी की स्मृतियों की तरफ लौटा।

मुझे याद नहीं कि कभी मेरी उनसे सीधी (व्यक्तिगत तौर पर) मुलाकात हुई हो लेकिन कुछ सभाओं में उनके वक्तव्यों को सुनने का अवसर मिला। उनके द्वारा संपादित पत्रिका ‘गांधी मार्ग‘ को, जब भी उपलब्धता रही; मैंने पढ़ा। उनकी पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब‘ को मैं चार बार पढ़ गया और हर बार ऐसा लगा कि देशज समाज का एक और हिस्सा, जिसकी तरफ ध्यान नहीं गया था, समझ में आया है। इस सबसे कब उनके प्रति एक स्वीकार्यता बनी, कह नहीं सकता। जीवन की जो सुखद अनुभूतियां होती हैं, अक्सर अनायास घटित हुआ करती हैं; उसके लिए प्रयास नहीं करना होता। बशर्ते कि आप जीवन की गरिमा को पवित्र भाव के साथ स्वीकारते हों। यही अनुभूति स्वयं में, समाज में ऊर्जा पैदा करती हैं। जिसके प्रेरणास्रोत अनुपम जी जैसे लोग होते हैं। उनके द्वारा पैदा की गई सजगता, कृतज्ञ समाज की धरोहर होती है। उस धरोहर में अनुपम जी जैसे व्यक्तित्व अपनी आभा फैलाते हैं। एक नई दिशा के लिए। ऐसी दिशा जो आधुनिकता व विकासवाद के उथले भ्रमजाल को तोड़ती है।

इस तथाकथित विकासवादी दौर में कुछ गिने-चुने लोग होंगे जो इतने व्यापक फलक व गहराई से समाज की; खासकर हिन्दुस्तानी समाज की गहराई को नाप पायें। अनुपम जी अक्सर भारतीय समाज में पानी की गहराई को नापने वाले लोगों का जिक्र किया करते थे। लेकिन स्वंय भी वे समाज की गहराई को नापने की क्षमता रखते थे और आजीवन यह किया भी। एक सभा में जब उन्होंने यह बात कही थी कि, “पर्यावरण केवल पेड़-पौधे ही नहीं बल्कि आस-पास का समाज भी सीखना है”, तब जो आज तक स्कूली रटी-रटाई बात थी कि पर्यावरण का मतलब पेड़-पौधे बचाना होता है, यह मान्यता धराशायी हो गयी थी। लगा था कि नई भाषा, शब्दावाली, अर्थहीनता व व्यवस्था ने समाज को कितना ठगा है। दिलो-दिमाग को कितना संकुचित बना दिया है।

पिछले 200-250 सालों में जबसे विचार का केन्द्र पश्चिम बन गया है और विचार के नाम पर सूचना परोसने की एकमात्र भाषा अँग्रेजी को मान लिया गया है। तब से विकास का मतलब; सबको एक तरह का खाना, रहना, पहनना, तीज-त्यौहार, खेती-बाड़ी इत्यादि का दौर चल पड़ा है। जबकि प्रकृति में विविधता है। जलवायु की भिन्न-भिन्न स्थितियाँ हैं। उसके अनुसार पशु-पक्षियों व वनस्पतियों की भी विविधता है। अलग-अलग पानी का वितरण भी इसी प्राकृतिक विविधता के आधार पर है। और हमारे समाज का गठन-संगठन इसी विविधता का सम्मान करके बना है। अनुपम जी के अनुसार, “ऐसा रंग-बिरंगा संगठन जो निराकार है। जिसमें कोई वार्षिक योजनायें नहीं बनानी पड़ती, गाड़ी, बंगले, मोटरकार, अध्यक्ष, मंत्री की आवश्यकता नहीं होती।” ऐसे स्वयंभू चलने वाला सामाजिक संगठन। जिससे समाज का अपना स्वभाव बना, शिक्षा व्यवस्था बनी, तीज-त्यौहार बने। ऐसे संस्कार बने जो हवा, पानी, माटी, बर्फ से बनते हैं ; लेपटाॅप, इन्टरनेट से नहीं। इतने बड़े सामाजिक संगठन को चलाने के लिए कोई लिखित नियम-कानून नहीं थे क्योंकि जरूरत ही नहीं थी। ये सब समाज जीवन का हिस्सा थे। जैसे साँस शरीर का हिस्सा होती है, याद नहीं करना पड़ता। अनुपम जी के अनुसार, समाज में यह भावना पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती थी कि, ‘अच्छे-अच्छे काम करते जाना।‘ जब वे ‘आज भी खरे हैं तालाब‘ पुस्तिका की पहली पंक्ति में बूढ़न किसान द्वारा बेटों को दी गयी इस सीख का उल्लेख करते हैं तो उनकी यह बात समझ में आती है कि समाज के संगठन की दो धुरियाँ हैं; आँख और पाँख। आँख से देखना और पाँख से उठाकर एक विहंगम दृश्य भी समाज का ले लेना। समाज में एक चीज देखना और सब चीजों को साथ में भी देखना। वर्तमान व्यवस्था ने समाज की इस आँख व पाँख की देखने की स्मृति को धुंधला कर दिया है। जो सीख बूढ़न किसान अपने बेटों को देता है कि, “अच्छे-अच्छे काम करते जाना”। ये जीवन की शिक्षा है। जिससे समाज बनता है और अनवरत चलता है। ये केवल स्कूल की चैहारदीवारी में बैठकर नहीं आता।

वर्तमान में शिक्षा भी, अपने वर्तमान से, अपने परिवेश से, अपने पर्यावरण (समाज) से कटी है। वह सब लोगों को एक सा काम सिखाती है फिर चाहे कोई हिमालयवासी हो या रेगिस्तानी इलाके में पढ़ रहा हो। एक सा पाठ्यक्रम सब जगह। पढ़ाई के विषय का अपने समाज से, लोगों से कुछ संबंध नहीं रहता। उसके प्रति इससे हीनता जरूर पनपती है। हमारे समाज संगठन में ‘स्वतंत्र समाज‘ के अपने सपने थे। इसलिए पाठ्यक्रम समाज की जरूरत का था। राजा (सरकार, बाजार) की मर्जी का नहीं। जिसमें जीवन की कुछ गंभीर बातों के अलावा, रोजमर्रा के काम की शिक्षा दी जाती थी। बाकी उसकी गहरी जड़ों व शाखाओं के अनन्त विस्तार समाज में पसरे थे। जिससे एक निराकार विशाल समाज संगठन चल रहा था।

अनुपम जी ने इस बात को गहराई से समझा था कि विकास की नई भाषा, शब्दावी व तकनीकी के गठजोड़ ने समाज की स्वाभाविक संगठन क्षमता को विस्मृत किया है। जिससे समाज का संगठन ढ़ीला पड़ा है। भाषा व समाज के बारे में उनकी ये स्पष्टता रही किसी भी क्षेत्र की समस्याएं उसकी अपनी भाषा में ही सामने आती हैं और उसके समाधान भी। क्योंकि भाषा केवल एक जुबान भर नहीं है। जुबान एक अंग है। जीभ का संचालन दिमाग से होता है। भाषा विशेष का दिमाग पर जो प्रभाव पड़ता है। वो दिमाग वहां के पर्यावरण व समाज से बनता है। आयातित भाषा होगी तो आयातित पर्यावरणीय व सामाजिक वातावरण भी साथ में लायेगी ये इस बात के साथ जुड़ा निहित तथ्य है। इसी तरह कुछ शब्दावली की जादूगरी पर उन्होंने ध्यान दिलाया कि ‘वाटर मैनेजमैन्ट‘ ‘सोशल फाॅरेस्ट्री,‘ ‘सेस्टेनेबल डेवलपमेंट‘ इत्यादि। इस देश मे पानी की सार-सँभार का, जंगलों की व्यवस्था का इतना बड़ा विकसित सामाजिक तंत्र या जिसको आयातित विचार ने शब्दावली ने अपनी भाषा को प्रतिष्ठित करके धूल-धूसरित कर दिया। सुदूर हिमालय में पानी की सार-सँभार का तरीका एक ही नहीं हो सकता। इस वास्तविक विज्ञान को समझकर समाज ने अपना तंत्र विकसित किया। नये विकास के घमण्ड में पढ़े-लिखे लोगांे में भ्रम फैल गया कि हम सूखा-गीले में व गीला सूखे में तब्दील कर देंगे। सरकारी तंत्र की ‘नदी जोड़ो परियोजना‘ इसी भ्रमज्ञान का प्रतीक है जिसमें न पर्यावरण की आँख है, न पाँख। ऐसे-ऐसे अंधविश्वास घर कर गये हैं कि यह भ्रम होने लगा है कि तकनीकी से भूमिगत पानी खींच लो, विज्ञान हमें पानी दे देगा। एक नदी सूख गई तो नदी जोड़ो परियोजना से दूसरी नदी ले आयेंगे। और तथ्य यह कि कोई भी तकनीकी तरीके से पानी निकाला जा सकता है, इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन पैदा नहीं किया जा सकता। आधुनिक होने के भ्रम में मनुष्य मूर्खता की हद लाँघने लगता है क्योंकि ऐसा होना आधुनिक होना है।

लेकिन हमारा आधुनिक होना व प्रकृति का आधुनिक होना एक जैसा नहीं है। प्रकृति का आधुनिक होना सहज गति से अपनी विविधताओं को सँजोना, पुष्पित-पल्लवित करना है। वहां गति का कोई त्वरित सिद्धान्त नहीं है। वहां हिमालय की बर्फ को रेगिस्तानी इलाके में लाने की आकांक्षा नहीं है। हिमालय की अपनी महिमा है, रेगिस्तान की अपनी। पंजाब के इलाके में गेहूँ होता है तो प्रकृति वहां धान उगाने की जिद पर नहीं अड़ेगी क्योंकि इससे संतुलन बिगड़ेगा। प्रकृति में हर व्यवस्था का सहज अंगीकार है। इसलिए जब हमारा डेवलॅपमैन्ट होता है जो सब जगह एक सी चीजें चाहता है तो प्रकृति की एक अस्वीकृति बनती है तो लंबे समय बाद समझ आती है क्योंकि अस्वीकार्यता की गति भी धीमी है। हमारा विकास का मतलब है कि किसी इलाके में आर्थिक उपक्रम बढ़े आर्थिक विकास ज्यादा हो गया तो वहां नदी सूख गई, पानी नहीं है। तो हम कहेंगे यह विकास की कीमत है। जंगल खत्म हो गया। यह आँख व पाँख से न देख पाने की फर्क है। इसलिए ‘विकास‘ शब्द आने के बाद अविकसित इलाकों की संख्या बढ़ गयी। डेवलपमेन्ट के आगे विशेषण लगाना पड़ा ‘सस्टनेबेल डेवलॅपमेन्ट‘। अनुपम जी के शब्दों में, “विनाश रहित विकास; निंदा रहित प्रशंसा”। विकास मीन्स विकास कहने में हिचक होने लगी है क्योंकि हमारी योजना व प्रकृति के स्वभाव का कोई मेल नहीं है। विदेशी पूंजी व टेक्नोलाॅजी के भ्रम ने कोई समस्या तो हल नहीं की बस ऋणम् कृत्वा घृतम् पीवेत् की धारणा जरूर पुष्ट कर दी। समाज की इन परिस्थितियों पर अनुपम जी का मार्गदर्शन हमारा प्रेरणास्रोत बना रहेगा।

मुझे फिर बूढ़न किसान की अपने बेटों को अंतिम विदा के समय कही पंक्तियां याद आ रही हैं, कि “अच्छे-अच्छे काम करते जाना, तालाब बनाते जाना।” मैं सोच रहा था कि इस बात में और ‘अच्छे दिन आयेंगे‘ के जुमले में कितना फर्क है। पहले में एक समाज भावना का अगली पीढ़ी को हस्तान्तरण है, कर्म की प्रेरणा है। तो दूसरे में ‘निराधार सान्तवना, खोखली दिलासा। अच्छे दिन आयेंगे विदेशी पूंजी से ऋण लेकर, प्रकृति की सहज व्यवस्था का मशीनीकरण के द्वारा शोषण से। आयेंगे आयातित अच्छे दिन, जो वैसे ही होंगे जैसे निन्दा रहित प्रशंसा वैसे बुरे दिन रहित अच्छे दिन। जिसमें कई हिस्से हम खो रहे हैं, खो चुके होंगे।

लेकिन अनुपम जी की ये बात कि ‘अच्छे-अच्छे काम करते जाना‘ हमारे समाज संगठन की धूल को पोंछकर उसकी स्मृति को लौटाने के लिए काफी हैं। कर्म हमारे अधिकार में है, फल हमारे अधिकार में नहीं। इस भाव से अच्छे काम करने की प्रेरणा, अपने समाज को विनम्र भाव से, बिना आयातित अंहकार के समझने की प्रेरणा; अनुपम जी के जीवन कर्म से मिलती है। यही उनके प्रति मेरी व देशज समाज की कृतज्ञ श्रद्धांजलि है।

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