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एक और बड़े भाई चल दिये
रवीन्द्र कुमार पाठक
मगध जल जमात, गया, बिहार

श्री अनुपम मिश्र आज शरीर छोड़ कर दूसरी दुनिया का तमाशा देखने निकल लिये। इतना सक्रिय जीवन जीने वाले अनुपम भाई से जब पिछले साल के आरंभ में 3 जनवरी को मिला तो उन्होने जीवन की जगह मौत पर ही चर्चा केन्द्रित कर दी। मुझे थोड़ा अटपटा लगाए हमारी आम चर्चा के विषय से अलग. न पानीए न पर्यावरण न अन्य सामाजिक प्रश्न। वे गांधी जी की मौत की सार्थकता पर बोल रहे थे। मैंने भी बेमतलब का विनोबाजी वाला प्रसंग जोड़ दिया।

बात करते.करते कुमार प्रशांत जी के साथ गांधी शांति प्रतिष्ठान के भोजनालय में बात पूरी हुई। दूसरे दिन मुझे जीवन के अर्थ और अर्थमय जीवन पर बोलना था। अनुपम भाई को अध्यक्षता करनी थी। दूसरे दिन मेरे व्याख्यान शुरू करने के ठीक पहले मुझे मेरे पिताजी के पटना में देहांत का समाचार मिला। खैरए पता नहीं मैं भी अपनी बेहोशी में जीवन की जगह मौत पर भी क्या क्या बोल गयाए जो उन्हें बहुत पसंद आ गया।

इसके कुछ दिन ही बाद पता चला कि डाक्टरी जांच में कैंसर पाया गया है। परिवार वालों को भले ही इसका पता बाद में चला हो या अनुपम भाई को भी बाद में पता चला हो लेकिन अब मुझे पक्का विश्वास हो गया है कि अनुपम भाई को अपनी आसन्न मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था। इलाज के दौरान भी जब मिला मेरे लाख विषय बदलने के प्रयास के बाद भी उनसे मेरी चर्चा मृत्यु पर ही केन्द्रित रही और हर बार हंसते हुए बोलते रहे. हांए तो रवीन्द्र भाई! मर कर ही तमाशा क्यों न देख लिया जाएघ् मुझे आज भी अजीब सा लग रहा है कि कहां से मुझे भी कब क्या सनक चढ़ जाती है और किसके सामने क्या बोल जाता हूं।

अनुपम भाई तो इस मामले में भी अनुपम ही निकले। कैंसर की भयानक पीड़ा में भी सब समझ बूझ कर परिवार के लोगों की संतुष्टि हेतु पीड़ादायी इलाज कराते रहेए आसन्न मृत्यु पर हंसते रहे और 18 दिसम्बर की रात्रि 2 बजे के बाद ष्ष्ष्मर कर तमाशा देखने निकल पड़े।ष्ष् पता नहीं तमाशा देख कर फिर उसी सरल जुबान में उस दुनिया का किस्सा सुनाने आयेंगे या नहींघ् यदि आ जाते तो बड़ा मजा आताए विवरण सधा हुआए सरल और आनंददायी रहता।
अनुपम भाई ! आपको मैं केवल प्रणाम ही कर सकता हूं। अंतिम यात्रा में भी शामिल नहीं हो सका। मेरे पास बड़े भाइयों की बहुत कमी है। पानी बाबा भी चल दिये और आप भी। अब जब बात समझ में नहीं आयेगी तो किससे पूछूँगद्य

खैरए आप जहां भी होंए मजे लीजिएए कोई न कोई मंडली बना ही लीजियेगा। अकेले रहने वाले तो आप हैं नहीं। हमें आपकी याद सताती रहेगीद्य इतना शीघ्र जाने की आशंका न थी कैंसर की सूचना के पूर्व तक।

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